Thursday, October 4, 2012

न जाने कब छुआ था, कागज़ का बदन स्याही से मैंने.....

न जाने कबसे,
जारी है ये वहशत/
ये खिलवाड़ लफ़्ज़ों से,
न जाने कब छुआ था,
कागज़ का बदन स्याही से मैंने?

उसके जाने के बाद तो नहीं!
उसके मिलने से पहले भी नहीं!
वहशत है तो,
आगाज़ खुशियों से हुआ होगा/
शायद तब...जब
उसने नज़रों से छुआ होगा/
लब्ज़ बस रास्ते ही होंगे,
मंजिल बस वो होगी,

अहसास बेताब होंगे/
हसरतें मचतली होंगी/
दिल बहकता होगा,
धडकनें संभलती होंगी/

बहुत वक़्त बीत गया है
याद भी नहीं मुझे,
न जाने कब कर ली थी दोस्ती,...
इस तन्हाई से मैंने/
न जाने कब छुआ था,
कागज़ का बदन स्याही से मैंने.....
-पुष्यमित्र उपाध्याय

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